भाजपा का भ्रष्टाचार : 5000 करोड़ के घोटाले में, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर का नाम आया !

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सुप्रीम कोर्ट ने माना भिवानी ‘दादम माइंस’ मामले मे हुआ उच्च स्तरीय प्रभाव का इस्तेमाल। लगभग 5000 करोड़ के घोटाले में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का हाथ !

भिवानी(हरियाणा) : भाजपा शासित एक और राज्य में घोटाले का जिन्न बाहर आया है,यह घोटाला दिल्ली से सटे हुए हरियाणा राज्य का हैं जहाँ अब सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि डाडम माइंस मामले में हाई लेवल की हस्तक्षेप से इसमें बड़ी गड़बड़ी की गई है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता सुंदर मार्केटिंग एसोसिएट्स (SML) को 30 नवंबर, 2017 तक डाडम में माइनिंग करने की इजाजत दी है। साथ ही यह भी कहा है कि वह सरकार को तयशुदा लीज रेंट, अन्य शुल्क और कर्मचारियों के वेतन-भत्ते का पूरा भुगतान करे। कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से पालन हो, यह देखने की जिम्मेदारी मुख्य सचिव डी.एस. ढेसी को सौंपी गई है।

वहीं, 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई है कि 18 सितंबर, 2012 एसएमएएल और केजेएसएल की जॉइंट वेंचर कंपनी बनना बताया गया है, लेकिन इस जेवी कंपनी का एग्रीमेंट ही रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। दोनों कंपनियों के बीच एग्रीमेंट में क्या-क्या शर्तें थीं, यह उसी से पता चल सकता था।
इस माइंस को लेकर पिछले साल कांग्रेस विधायक करण दलाल ने वित्तमंत्री कैप्टन अभिमन्यु पर पद के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कार्रवाई की मांग की थी।

वेदपाल तंवर (सामाजिक कार्यकर्ता हिसार) : इसमें करीब 2000 करोड़ का खेल, सीबीआई जांच हो !

वेदपाल तंवर (सामाजिक कार्यकर्ता हिसार) का कहना है कि डाडम की माइंस में करीब 2000 करोड़ का घपला है। इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए। मैंने पहले भी इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। तब राज्य सरकार ने इसकी लीज कैंसिल कर दी थी। इसी के साथ ही याचिका का निस्तारण हो गया था। लेकिन, अब सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि इसमें उच्च स्तर से प्रभाव डाला गया था। इसलिए इसकी सीबीआई जांच होनी चाहिए।

जाने क्या है पूरा मामला –

इस माइंस की ऑक्शन तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय वर्ष 2013 में हुई थी। उसी समय इसकी शर्तें इस तरह से बनाई गई थीं, ताकि एक कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाया जा सके। इसके लिए लीज रेंट बहुत ही कम यानी केवल 6.25 करोड़ रुपए रिजर्व प्राइस के तौर पर रखा गया। लेकिन 30 दिसंबर, 2013 को हुई नीलामी में जॉइंट वेंचर कंपनी ने सर्वाधिक बोली 115 करोड़ रुपए सालाना लगाई थी। लीज अवधि 10 साल रखी गई थी। 3 जनवरी, 2014 को निर्धारित 25 फीसदी राशि 28.75 करोड़ रुपए जमा करवा कर कंपनी ने एलओआई ले लिया।

लेकिन माइनिंग शुरू करने के बजाय कंपनी ने हाईकोर्ट में लीज कैंसिल करने के लिए याचिका लगा दी। इसमें यह माइंस एचएसआईआईडीसी को देने का आग्रह किया गया, जबकि उसके पास पहले ही एक माइंस थी। हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी। राज्य में जब सत्ता बदली तो सुंदर मार्केटिंग एसोसिएट्स (एसएमएएल) ने सरकार से यह कहते हुए माइंस चलाने की अनुमति मांगी कि वह पूरा लीज रेंट देने को तैयार है क्योंकि उसकी पार्टनर फर्म केजेएसएल इससे बैक आउट कर गई है।

सरकार ने एडवोकेट जनरल की कानूनी राय लेने के बाद लीज ट्रांसफर करने की अनुमति दे दी। जबकि माइनिंग लीज की शर्त संख्या 36 के मुताबिक पहले 5 साल तक लीज ट्रांसफर नहीं हो सकती थी। दूसरे बैक आउट करने वाली फर्म के पास 51 फीसदी शेयर थे, जबकि एसएमएएल 49 फीसदी शेयर रखती थी। इसके बाद एसएमएएल की लीज कैंसिल करने के लिए सरकार में फिर खींचतान शुरू हुई। इस बार फिर एडिशनल सॉलिसीटर जनरल की कानूनी राय लेकर लीज कैंसिल करने का नोटिस दिया गया। इसके खिलाफ एसएमएएल कंपनी पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट गई।

Source – Haryana Samay

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