देश में बुरी तरह फैला अंतहीन कृषि संकट, पिछले 3 सालों में 50 हजार से अधिक किसानों ने की आत्महत्या !

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भारत एक किसान प्रधान देश है जहाँ देश का ‘अन्न का कटोरा’ कहा जाने वाला पंजाब कई विरोधाभासों का सामना कर रहा है। जबसे हरित क्रांति की शुरुआत हुई, पंजाब ने साल दर साल रिकॉर्ड स्तर पर अतिरिक्त अनाज का उत्पादन किया, फिर भी यह वर्षों से किसान आत्महत्या के कारण कब्रगाह में तब्दील हो गया है। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता होगा, जब पंजाब के अखबारों में किसान आत्महत्या की खबर न छपती हो। अब सोचिये और चिंतन करिये कि जब पंजाब के किसानों का ये हाल है तो देश के अन्य राज्यों के किसानों का क्या हाल होता होगा। हमारे देश की सरकार सो रही है और किसानों के हितों के लिए यूँ तो कागजों पर बहुत सारी स्कीमें हैं, पर असल में किसानों तक पहुँचता कुछ भी नहीं जिसके कारण देश के किसानों की हालत दिन पर दिन और अधिक खराब होती जा रही है।

पंजाब राष्ट्रीय खाद्यान्न भंडार में सबसे ज्यादा योगदान करने वाला राज्य है। चाहे कोई भी साल हो या मौसम कितना भी खराब क्यों न हो, पंजाब देश को भोजन उपलब्ध कराने में कर्तव्यनिष्ठ रहा है। लेकिन हर बीतते वर्ष के साथ किसानों की बिगड़ती हुई गंभीर त्रासदी साल दर साल होने वाले बंपर अनाज पैदावार को झुठलाती है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक, पिछले 17 वर्षों में 16,000 किसानों एवं कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की। इनमें से 83 फीसदी ने कर्ज के बढ़ते बोझ के कारण खुदकुशी की और 76.1 फीसदी किसानों के पास दो एकड़ से भी कम जमीन थी। राज्य का हर तीसरा किसान गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करता है। सबसे खराब यह कि खुदकुशी करने वाले किसानों एवं कृषि मजदूरों में से करीब 66 फीसदी युवा थे। जाहिर है, अन्य युवाओं की तरह उनके भी कुछ सपने होंगे। पर किस चीज ने उन्हें अपना जीवन खत्म करने के लिए मजबूर किया?

दो भाइयों के उदाहरण से इसे समझते हैं- चालीस वर्ष के रूप सिंह और उनके छोटे भाई बत्तीस वर्षीय बसंत सिंह ने कुछ हफ्ते पहले भाखड़ा नहर में कूदकर खुदकुशी कर ली। वे पटियाला जिले के निवासी थे। दोनों भाइयों के पास कुल ढाई एकड़ जमीन थी और वे बटाई पर अतिरिक्त तीस एकड़ भूमि पर खेती करते थे। लेकिन खेती से लाभ कमाने में असमर्थ होने के कारण उनके बकाया कर्ज का पहाड़ बढ़ता चला गया। इनके पिता ने भी ऐसी ही परिस्थिति में वर्ष 2008 में खुदकुशी कर ली थी। परिवार की दो पीढ़ियों को खेती के कर्ज ने लील लिया।

पंजाब के किसानों की यह त्रासदी देश भर के खेतिहर समाज की सच्चाई है। जिन लोगों ने खुदकुशी करने जैसा अतिवादी कदम नहीं उठाया, उनकी भी स्थिति बेहतर नहीं। वे भारी तनाव, मानसिक पीड़ा और अवसाद में किसी तरह उम्मीदों के भरोसे जीवित हैं। खाद्यान्न का कटोरा कहा जाने वाला राज्य किसानों के लिए कब्रगाह कैसे बन गया? पंजाब इस अंतहीन कृषि संकट की गिरफ्त से कैसे उबर सकता है?

इस तरह की दुखद धारावाहिक मौत एक ऐसे राज्य के साथ जुड़ी है, जिसे कृषि के मामले में सबसे समृद्ध माना जाता है। यह स्पष्ट रूप से बताता है कि यह संकट गहन कृषि मॉडल से संबंधित एक स्वाभाविक दोषपूर्ण उच्च उत्पादकता का नतीजा है। अक्सर कृषि अर्थशास्त्री और नीति निर्माता कम उत्पादकता, फसल वैविध्यीकरण की विफलता और सिंचाई के अभाव को इसका जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन ऐसे राज्य में जहां 98 फीसदी कृषि भूमि सिंचित है और जहां धान एवं गेहूं की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अंतरराष्ट्रीय स्तर के बराबर है, वहां किसानों की आत्महत्या का कोई कारण नजर नहीं आता। वर्ष 2016 के आर्थिक सर्वे के अनुसार, पंजाब में प्रति हेक्टयर गेहूं का उत्पादन 4,500 किलोग्राम है, जो अमेरिका के बराबर है। जबकि वहां प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन 6,000 किलोग्राम है, जो चीन की धान उत्पादकता के करीब है। यह कहना भी सही नहीं है कि ये किसान आलसी हैं और जिन उद्देश्यों के लिए कर्ज लेते हैं, उन पर खर्च नहीं करते। अगर यह सही होता, तो पंजाब वैश्विक फसल उत्पादकता में शीर्ष पर नहीं होता।

सघन कृषि को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक व विकासात्मक नीतियों के कारण पंजाब का संकट भयंकर है। अपनी खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संयुक्त पंजाब (हरियाणा समेत) अत्यधिक सघन कृषि का केंद्र बन गया। इसकी शुरुआत धान एवं गेहूं की खेती से हुई, फिर यह कपास जैसे नकदी फसल की तरफ मुड़ गया। सघन कृषि में रासायनिक उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल के कारण जहां मिट्टी की उर्वरता पूरी तरह खत्म हो गई, वहीं रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग और दुरुपयोग से खाद्य शृंखला के साथ-साथ पर्यावरण भी प्रदूषित हुआ। यही वजह है कि पंजाब तेजी से कैंसर के एक प्रमुख केंद्र में तब्दील हो गया।

पीएयू की रिपोर्ट बताती है कि कपास की गहन खेती ने बाद में इसे आत्मघाती फसल बना दिया। कीटों के हमले के कारण अनुवांशिक रूप से संशोधित बीटी कपास की विफलता ने कर्ज के पहाड़ को और बढ़ाया। असल में 80 फीसदी से ज्यादा किसानों की आत्महत्या कपास उत्पादन क्षेत्र में हुई है। संयोग से ये क्षेत्र दो राजनीतिक परिवारों-प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरिंदर सिंह के निर्वाचन क्षेत्र भी हैं।

त्रासदी यह है कि हमने कोई सबक नहीं सीखा है। कृषि मंत्रालय और नीति आयोग इन्हीं नीतियों को बाकी के राज्यों में आगे बढ़ा रहे हैं और चाहते हैं कि वे पंजाब की फसल उत्पादकता के स्तर को हासिल करें, नतीजतन यह मानवीय त्रासदी बढ़ती जा रही है। मानो यही काफी न हो, अब कोशिश यह की जा रही है कि पंजाब पर्यावरण के लिए घातक कृषि व्यवसाय में उतरे, जिसके लिए और अधिक सघन खेती की जरूरत है और उससे ग्रीनहाउस गैसों का ज्यादा उत्सर्जन बढ़ेगा। यह तपते तवे से आग में कूदने जैसा है।

पंजाब को सघन खेती के तंत्र से बाहर निकलने की भारी आवश्यकता है। अगर हम किसानों को बचाना चाहते हैं, तो पंजाब को समयबद्ध तरीके से पारिस्थितिकी टिकाऊ कृषि व्यवस्था की तरफ बढ़ना होगा। इसके लिए नीतियों और कार्यक्रमों के जरिये पीएयू के अनुसंधान जनादेश में बदलाव की आवश्यकता है, जो किसानों को बिना किसी आर्थिक नुकसान के बदलाव के लिए प्रेरित करे। पंजाब को राज्य किसान आय आयोग का भी गठन करना चाहिए, ताकि किसानों के लिए निश्चित मासिक आय की व्यवस्था की जा सके।

यह रिपोर्ट देविंदर शर्मा जी ने बनायी है।

Source – Amarujala

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