बर्खास्त होंगे नीतीश कुमार ? सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, चुनाव आयोग को भेजा नोटिस !

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नई दिल्ली, नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला लेते हुए चुनाव आयोग से इस बाबत जवाब मांगा है। अगर सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के फैसले से सहमत नहीं होता है तो मुमकिन है कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया जाए।

नीतीश कुमार को अयोग्य करार दिए जाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी करते हुए दो हफ्ते में जवाब तलब किया है।

सुप्रीम कोर्ट के वकील एमएल शर्मा ने नीतीश के खिलाफ दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में खुद के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमों की बात छुपाई।] याचिका में कहा गया है कि, नीतीश कुमार ने 2004 और 2012 के चुनाव में दाखिल शपथ पत्र में 1991 में हुई हत्या के एक मामले में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर का जिक्र नहीं किया। नीतीश ने अपने हलफनामे में यह साक्ष्य छुपाया है और इस कारण वह इस संवैधानिक पद पर नहीं रह सकते। उन्हें विधान परिषद की सदस्यता से अयोग्य करार दिया जाए।

लालू प्रसाद यादव ने किया था बड़ा खुलासा !

महागठबंधन टूटने पर राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार पर हत्या के मामले में नामजद होने का बड़ा खुलासा किया था। जिसके बाद से जांच पड़ताल में नीतीश कुमार के ऊपर लालू प्रसाद यादव द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए गए थे।

नीतीश कुमार के ऊपर हत्या का यह मामला 1991 का है जिसे 26 साल हो चुके हैं, जिसमें पंडारख थानाक्षेत्र में पड़ने वाले ढीबर गांव के रहने वाले अशोक सिंह ने नीतीश कुमार सहित कुछ अन्य लोगों पर हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था। अशोक सिंह ने इस बाबत दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया था कि बाढ़ सीट पर मध्यावधि चुनाव में वह अपने भाई सीताराम सिंह के साथ वोट देने मतदान केंद्र गए थे, तभी इस सीट से जनता दल उम्मीदवार नीतीश कुमार वहां आ गए। उनके साथ मोकामा से विधायक दिलीप कुमार सिंह, दुलारचंद यादव, योगेंद्र प्रसाद और बौधु यादव भी थे। सभी लोग बंदूक, रायफल और पिस्तौल से लैस होकर आए थे।

एफआईआर में आगे कहा गया है, फिर अचानक नीतीश कुमार मेरे भाई को जान से मारने की नीयत से फायर किया, जिससे घटनास्थल पर ही उनकी मौत हो गई। एफआईआर के मुताबिक, इस घटना में शिकायतकर्ता के अलावा चार अन्य लोग भी घायल हो गए।

नीतीश के खिलाफ दर्ज इस FIR को लेकर अब यह बात सामने आ रही है कि 1991 का यह मामला वर्ष 2009 में दोबारा उछला था। तब 1 सितंबर 2009 को बाढ़ कोर्ट के तत्कालीन अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (एसीजेएम) रंजन कुमार ने इस मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ मामले में ट्रायल शुरू करने का आदेश दिया था।

इस पर फिर नीतीश कुमार ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दर्ज कर मामले को रद्द करने की मांग की थी। इस पर हाईकोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत के आदेश पर स्टे लगा दिया और इस हत्याकांड में नीतीश के खिलाफ चल रहे सभी मामलों को उसके पास स्थानांतरित करने को कहा था। हालांकि नीतीश कुमार के दबाव के चलते हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद इन 8 वर्षों के दौरान इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई।

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