आज होगी राष्ट्रपति चुनाव की वोटिंग, जमकर हो सकती है क्रॉस वोटिंग, देखें कैसे होता है चुनाव !

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देश का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा इसके लिए अब से कुछ देर में वोटिंग शुरू होगी। इस बार मुकाबला NDA के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद और विपक्ष की साझा उम्मीदवार मीरा कुमार के बीच है। वोटों की गिनती 20 जुलाई को दिल्ली में होगी, जहां सभी बैलेट बॉक्स लाए जाएंगे। इसी दिन नतीजों का भी ऐलान होगा।

आज संसद भवन और राज्य विधानसभाओं में सुबह 10 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक वोट डाले जाएंगे. इससे पहले बिहार के पूर्व राज्यपाल रामनाथ कोविंद और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने समर्थन जुटाने के मकसद से राज्यों के दौरे किए। इस चुनाव में दिलचस्प बात यह है कि बिहार में महागठबंधन में साथ जेडीयू और आरजेडी ने अलग-अलग उम्मीदवारों को वोट करने का फैसला किया है।

जेडीयू बिहार के राज्यपाल रहे रामनाथ कोविंद का समर्थन कर रही है तो आरजेडी मीरा कुमार का समर्थन कर रही है। मीरा कुमार बिहार की बेटी है जिसके चलते क्रॉस वोटिंग का भी अनुमान लगाया जा रहा है।

समाजवादी पार्टी भी दो हिस्सों में बंटी हुई नज़र आ रही है। जहां लोकसभा सांसद और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल सिंह यादव कोविंद का समर्थन करते दिख हे हैं तो अखिलेश यादव जो कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं ने विपक्ष की साझा उम्मीदवार मीरा कुमार को समर्थन देने का वादा किया है।

आखिरी समय में में आम आदमी पार्टी ने भी अपना समर्थन भी मीरा कुमार को देने का फैसला किया है। राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवार के दलित समाज के आने से दलित सांसद और विधायकों के क्रॉस वोटिंग करने का भी अनुमान लगाया जा रहा है।

राष्ट्रपति चुनाव में 4895 वोटर हैं, जिसमें 776 सांसद हैं जबकि 4120 विधायक हैं। राष्ट्रपति चुनाव में कुल पड़ने वाले वोटों की संख्या दस लाख 98 हज़ार 903 है। अगर क्रॉस वोटिंग नहीं हुई तो NDA प्रत्याशी रामनाथ कोविंद को 63 फीसदी वोट मिलने की उम्मीद है।

राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए योग्यता
भारतीय नागरिक हो
उम्र 35 साल से ज़्यादा हो
लोकसभा सदस्य बनने के योग्य
किसी लाभ के पद पर न हो
करीब 50 सांसदों-विधायकों को समर्थन हो

कौन चुनता है राष्ट्रपति?
सांसद, विधायक लेते हैं हिस्सा
अभी 776 सांसद, 4120 विधायक हैं वोटर

सांसदों के वोट का मूल्यांकन
कुल सांसद- 776
लोकसभा- 543
राज्यसभा- 233
देश के विधायकों के मूल्य को कुल सांसदों की संख्या से भाग दिया जाता है इससे एक सांसद का वोट मूल्य आता है जो इस समय 708 है
अब एक सांसद के वोट मूल्य को सांसदों की संख्या से गुणा करने पर कुछ सांसदों का वोट मूल्य निकलता है
इस समय सांसदों का वोट मूल्य 5,49,408 है
अब सांसदों और विधायकों का वोट मूल्य जोड़ा जाता है (5,49,495+5,49,408= 10,98,903)
चुनाव जीतने के लिए 5,49,442 वोट चाहिए

कैसे होता है राष्ट्रपति चुनाव –

राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल करता है जिसे इलेक्टोरल कॉलेज कहते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 54 में इसका जिक्र किया गया है। इसके अनुसार जनता राष्ट्रपति के चुनाव में सीधे भाग नहीं ले सकती है, बल्कि उसके वोट से चुने गए प्रतिनिधि करते हैं। राष्ट्रपति का चुनाव एक अप्रत्यक्ष निर्वाचन है। इस समय राष्ट्रपति चुनाव के लिए जो इलेक्टोरल कॉलेज है, उसके सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है। तो जीत के लिए कैंडिडेट को हासिल करने होंगे 5,49,442 वोट। जो प्रत्याशी सबसे पहले यह कोटा हासिल करता है, वह राष्ट्रपति चुन लिया जाता है।

राष्ट्रपति चुनाव में सभी प्रदेशों की विधानसभाओं के चुने गए सदस्य और लोकसभा तथा राज्यसभा में चुनकर आए सांसद वोट डालते हैं। राष्ट्रपति की ओर से संसद में नामित सदस्य वोट नहीं डाल सकते। राज्यों की विधान परिषदों के सदस्यों को भी वोटिंग का अधिकार नहीं है, क्योंकि वे जनता द्वारा चुने गए सदस्य नहीं होते।

राष्ट्रपति चुनाव में एक खास तरीके से वोटिंग होती है, जिसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहते हैं। यानी वोटर एक ही वोट देता है, लेकिन वह मौजूद कैंडिडेट्स में से अपनी वरीयता तय कर देता है। यानी वह बैलट पेपर पर बता देता है कि उसकी पहली पसंद कौन है और दूसरी, तीसरी कौन। यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं हो सका, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। इसलिए इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है।

वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के वोट का वेटेज अलग-अलग होता है। दो राज्यों के विधायकों के वोटों का वेटेज भी अलग होता है। यह वेटेज जिस तरह तय किया जाता है, उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कहते हैं।

कैसे तय होता है यह वेटेज?

विधायक के वोटों का वेटेज – जिस राज्य का विधायक हो, पहले उसकी आबादी देखी जाती है। इसके साथ उस प्रदेश के विधानसभा सदस्यों की संख्या को भी ध्यान में रखा जाता है। वेटेज निकालने के लिए प्रदेश की जनसँख्या को चुने गए विधायकों की संख्या से भाग (डिवाइड) दिया जाता है। इस तरह जो संख्या मिलती है, उसे फिर 1000 से भाग दिया जाता है। अब जो आंकड़ा आता है, वही उस राज्य के एक विधायक के वोट का वेटेज होता है। 1000 से भाग देने पर अगर शेष 500 से ज्यादा हो तो वेटेज में 1 जोड़ दिया जाता है।

सांसदों के वोटों का वेटेज – सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुने गए सदस्यों के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है। अब इस सामूहिक वेटेज को राज्यसभा और लोकसभा के चुने गए सदस्यों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है। इस तरह जो नंबर मिलता है, वह एक सांसद के वोट का वेटेज होता है। अगर इस तरह भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा बचता हो तो वेटेज में एक का इजाफा हो जाता है।

वोटों की गिनती कैसे होती है !

राष्ट्रपति के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट हासिल करने से ही जीत तय नहीं होती है। राष्ट्रपति वही बनता है, जो सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधा से ज्यादा हिस्सा हासिल करता है। यानी इस चुनाव में पहले से तय होता है कि जीतने वाले को कितना वोट यानी वेटेज पाना होगा। जितने वाले को 5,49,442 वोट चाहिए होते हैं।

जीत कैसे निर्धारित होती है !

सांसद या विधायक वोट देते वक्त अपने मतपत्र पर बता देते हैं कि उनकी पहली वरीयता वाला उम्मीदवार कौन सा है, दूसरी पसंद वाला कौन और तीसरी पसंद वाला कौन आदि आदि। सबसे पहले सभी मतपत्रों पर दर्ज पहली वरीयता के मत गिने जाते हैं। यदि इस पहली गिनती में ही कोई उम्मीदवार जीत के लिए जरूरी वेटेज का कोटा हासिल कर ले, तो उसकी जीत हो जाती है। लेकिन अगर ऐसा न हो सका, तो फिर एक और कदम उठाया जाता है।

पहले उस प्रत्याशी को दौड़ से बाहर किया जाता है, जिसे पहली गिनती में सबसे कम वोट मिले। लेकिन उसको मिले वोटों में से यह देखा जाता है कि उसकी दूसरी पसंद के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं। फिर सिर्फ दूसरी पसंद के ये वोट बचे हुए उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर किए जाते हैं। यदि ये वोट मिल जाने से किसी उम्मीदवार के कुल वोट तय संख्या तक पहुंच गए तो वह उम्मीदवार विजयी माना जाएगा। अन्यथा दूसरे दौर में सबसे कम वोट पाने वाला रेस से बाहर हो जाएगा और यह प्रक्रिया फिर से दोहराई जाएगी। इस तरह वोटर का सिंगल वोट ही ट्रांसफर होता है। यानी ऐसे वोटिंग सिस्टम में कोई मैजॉरिटी ग्रुप अपने दम पर जीत का फैसला नहीं कर सकता है। छोटे-छोटे दूसरे ग्रुप्स के वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं। यानी जरूरी नहीं कि लोकसभा और राज्यसभा में जिस पार्टी का बहुमत हो, उसी का दबदबा चले। विधायकों का वोट भी अहम है।

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