सन्यासी से सीएम बनने वाले योगी के ऑफिस में भ्रष्टाचार का बोलबाला, शिकायतकर्ता पर ही मुकदमा हुआ !

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लखनऊ : यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार लगातार कठघरे में खड़ी नजर आ रही है, भ्रष्टाचार को लेकर जहाँ सीएम योगी ज़ीरो टॉलरेंस की बात करते हुए बड़े-बड़े दावे करते हैं तथा सार्वजनिक मंचों से अपने हर भाषण में वा अफसरों की मीटिंग में वे भ्रष्टाचार पर भाषण देना नहीं भूलते हैं । वहीँ अब उनकी सरकार की पोल पूरी तरह खुल गयी है, अब मुख्यमंत्री योगी का दफ्तर ही सवालों के घेरे में आ गया है। हालाँकि योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आ रहे थे, पर मुख्यमंत्री के कारण उन सभी मामलों पर पर्दा डाल दिया जाता रहा है।

सन्यासी से सीएम बनने वाले योगी आदित्यनाथ के राज में कैसे बढ़ा भृष्टाचार !

योगी आदित्यनाथ 22 साल की उम्र में अपना परिवार छोड़ दिया और गोरखपुर चले आए, यहां उन्होंने सन्यास ले लिया और तब उन्हें नया नाम मिला- योगी आदित्यनाथ।

सन्यासी से सीएम बनने वाले योगी आदित्यनाथ महंतगिरि के साथ राजनीति में भी खुद गए और 26 साल की उम्र में ही योगी सांसद बन गए। शुरूआत में ही वह बीजेपी के सहयोगी संगठन से जुड़ गए थे लेकिन 1991 में उन्हें छात्र संघ का टिकट नहीं मिला, उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा लेकिन हार गए।

गोरखधाम पीठ के महंत अवैद्यनाथ ने उन्हें बाद में अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। सितंबर 2014 में महंत अवैद्यनाथ की मृत्यु के बाद योगी को महंत घोषित किया गया, माना जाता है कि धर्म के आधार पर योगी पूर्वी यूपी में अच्छा प्रभाव रखते हैं। 1998 में योगी पहली बार सांसद बने थे उसके बाद तो लगातार वह सांसद रहे। 2002 में उन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी का गठन किया, हालांकि 2017 में सीएम बनने के बाद उन्हें सांसद पद छोड़ना पड़ा।

मुख्यमंत्री दफ्तर में ही जब भ्रष्टाचार होगा तो प्रदेश का क्या भविष्य होगा ?

बता दें कि रामराज्य की बात करने वाले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनथ के राज में आरोप राज्य के सबसे ताक़तवर आईएएस अफसर पर लगे हैं, वो भी खुलेआम। एसपी गोयल सीएम योगी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी हैं, उन पर 25 लाख रूपये घूस मांगने के आरोप एक 22 साल के नौजवान अभिषेक गुप्ता ने मीडिया के सामने आकर खुलेआम लगाया हैं। अभिषेक गुप्ता की शिकायत पर राज्यपाल राम नाइक ने इस मामले की जांच के लिए योगी आदित्यनाथ से कहा, इसके लिए उन्होंने 30 अप्रैल को सीएम को चिट्ठी भी भेज दी, लेकिन 40 दिनों बाद भी इस मामले में न तो जांच हुई, न कोई कार्रवाई हुई। अब बात है कि जब मुख्यमंत्री दफ्तर में ही भ्रष्टाचार होगा तो प्रदेश का क्या भविष्य होगा ?

गौरतलब है कि गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से हुई मासूम बच्चों की मौत जैसे बड़े हादसे में भी योगी सरकार में हो रहा भृष्टाचार ही असल वजह था, जिसके कारण स्वास्थ विभाग के अधिकारियों ने अपने कमिशन के लिए अस्पताल की अति आवयश्यक वित्तीय फाइलों को रोक रखा था। वहीं शिक्षा विभाग की मंत्री अनुपमा जायसवाल पर तो उनके सांसद ने ही भ्रष्टाचार के सीधे आरोप लगाते हुए कहा था कि मंत्री जी स्कूलों में मिलने वाले जूते-मोजों के टेंडर में भृष्टाचार कर रही हैं। अभी हाल में नॉएडा में भृष्टाचार को लेकर जिले के आईएएस-आईपीएस में आपसी तनातनी तक हो गयी थी, वहीँ कुछ माह पहले बाराबंकी में पुलिस विभाग का एक भृष्टाचार सामने आया था जिसमे थानों और चौकी में पोस्टिंग को लेकर पैसों का लेन-देन खुलेआम चल रहा था।

भाजपा नेताओं ने उलटा शिकायतकर्ता अभिषेक गुप्ता पर ही दर्ज करा दिया मुकदमा !

बीजेपी भी इस खेल में शामिल हो गई, लखनऊ में पार्टी के कार्यालय प्रभारी की शिकायत पर उलटा अभिषेक गुप्ता पर ही मुक़दमा दर्ज कर लिया गया। अभिषेक गुप्ता ने ही सीएम योगी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी एसपी गोयल गोयल पर घूस मांगने का आरोप लगाया है। गोयल के घूस मांगने का मामला रफ़ा दफ़ा हो जाता, लेकिन मीडिया को राज्यपाल की चिट्ठी मिल गई। इसके बाद शुरू हुआ सबसे ताक़तवर आईएएस अधिकारी को बचाने का खेल। योगी आदित्यनाथ के प्रमुख सचिव एसपी गोयल को बचाने की रणनीति बन गई है, उन पर 25 लाख रूपये घूस मांगने का आरोप लगाने वाले अभिषेक गुप्ता को जेल भेजने की तैयारी है।

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