कार्यवाहक निदेशक N.L Srivastava ने बर्बाद किया “राज्य स्वास्थय एवं परिवार कल्याण संस्थान,इंदिरा नगर,लखनऊ” का उद्देश्य और भविष्य

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राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान,इंदिरा नगर,लखनऊ,उत्तर प्रदेश में कार्यवाहक निदेशक नागेंद्र लाल श्रीवास्तव (N.L Srivastava) के द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार एवं दुर्व्यवस्थाओं ने संस्थान के उद्देश्य को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है ।

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लखनऊ :  राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान,इंदिरा नगर,लखनऊ,उत्तर प्रदेश राज्य स्तर का शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान है। यहाँ पर प्रायः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है,इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से सम्बंधित शोध एवं मूल्यांकन कार्य भी होते रहते हैं। यह प्रदेश के अन्य विभागों की तरह राज्य स्तरीय प्रशिक्षण संस्थान है तथा यहाँ राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के उच्च अधिकारियों एवं विशेषज्ञों का आगमन समय-समय पर शोध,प्रशिक्षण एवं मूल्यांकन कार्यों के लिए होता रहता हैं।

राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान,इंदिरा नगर,लखनऊ,उत्तर प्रदेश में कार्यवाहक निदेशक प्रोफेसर नागेंद्र लाल श्रीवास्तव (N.L Srivastava) के संरक्षण में भ्रष्टाचार एवं दुर्व्यवस्था बढ़ती ही जा रही है,जिसमे संस्थान की छवि पूरी तरह से धूमिल हो रही है तथा कार्यवाहक निदेशक प्रोफेसर नागेंद्र लाल श्रीवास्तव संस्थान को चलाने में पूरी तरह से अक्षम साबित हो रहे हैं।

कार्यवाहक निदेशक एन०एल श्रीवास्तव के द्वारा संस्थान में किये गए भ्रष्टाचार एवं दुर्व्यवस्था पर एक नजर —-

1) प्रोफेसर एन०एल श्रीवास्तव अपनी प्रारंभिक नौकरी से कार्यवाहक निदेशक बनने में झूठ,छल और फरेब के सहारे शासन को भ्रमित करते हुए पहुंचे हैं। संलग्न शासनादेश (1993) के अनुसार इन्हे संविदा पर सहायक निदेशक तैनात किया गया फिर संलग्न शासनादेश (1994) में वेतनमान दे दिया गया। पुनः शासनादेश (1996) के द्वारा प्रोफेसर एजुकेशन ट्रेनिंग बनाया गया ,तत्पश्चात शासनादेश (1999) में इन्हे वेतनमान दे दिया गया,यहाँ तक कि संलग्न शासनादेश (1995) में इनका पद सृजित नहीं है और (1996) के विज्ञापन में क्रमांक नंबर – 02 पर रखा गया है और उसके सामने कोई भी वेतन नहीं लिखा गया है। यदि इनका पद पहले से ही सृजित था तो इसे विज्ञापन के क्रमांक नंबर – 01 पर रखा जाना चाहिए था और यह पद पर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी का चुनाव होता। प्रोफेसर एन०एल श्रीवास्तव की यह एक सोची समझी चाल थी,इनकी नियुक्ति ही विवादस्पद एवं संदेहपूर्ण है।

2) प्रोफेसर एन०एल श्रीवास्तव प्रायः से ही निजी स्वार्थ के लिए हमेशा से उच्च अधिकारियों एवं शासन को संस्थान के विषय में भ्रमित एवं गुमराह करते रहे हैं। इनका एक चहेता अधिकारी जिसको DDO बनाये हुए हैं ,उसके द्वारा छात्रावास एवं मेस के नाम पर फर्जी बिल वाउचर लगाकर धनउगाही की जा रही है। संस्थान में मेस चलता है तथा परीक्षार्थी छात्रावास में ठहरते है उनके द्वारा प्रायः खाने ,ठहरने एवं अन्य व्यवस्था से सम्बंधित प्रशिक्षण के दौरान शिकायतें मिलती रहती है। यहाँ तक की खाने में कीड़े परोसे जाते हैं,जबकि NHM के मद से प्राप्त धनराशि से प्रति वर्ष लाखो की खरीद फरोख्त होती है और क्रय किये गए सामानो का कुछ पता नहीं चलता है तथा आपस में मिलकर धनउगाही कर रहे हैं।

3) प्रोफेसर एन०एल श्रीवास्तव द्वारा अपने गृहक्षेत्र के एक कनिष्ट सहायक जो संस्थान का कर्मचारी भी नहीं है उसे संस्थान में विगत 15 वर्ष से आवास आवंटित कराये है। जबकि उसके द्वारा मकान के किराए एवं बिजली का भुगतान विगत 15 वर्षों से नहीं किया जा रहा है। संस्थान के कर्मचारियों के प्रार्थना पत्र को दरकिनार कर खाली पड़े आवासों को आवंटित नहीं किया जा रहा है तथा संस्थान में बने आवासों के रख-रखाव में आने वाले पूरी धनराशि को सिर्फ भ्रष्टाचार की भेट चढ़ा दिया जाता है और संस्थान के आवासों पर कुछ भी खर्च नहीं किया जाता है।

4) प्रोफेसर एन०एल श्रीवास्तव पिछड़े एवं अनुसूचित जाती के अद्धिकारियों एवं कर्मचारियों को टारगेट बनाकर बदले की भावना से कार्य कर रहे है,उनके हितो को दरकिनार कर नियम विरुद्ध कृत्यों से संस्थान में विवाद बढ़ते ही जा रहे है। संस्थान में अराजकता का माहौल उत्पन्न है तथा वह सिर्फ झूठ बोलकर शासन को गुमराह करते हुए निजी स्वार्थ में लगे हुए हैं।

5) प्रोफेसर एन०एल श्रीवास्तव को यह बात मालुम है कि निदेशक के पद का विज्ञापन होने पर स्वयं इस पद की अहर्ता सीमा उम्र सीमा 52 वर्ष राखी गयी है,जिसके लिए वह अहर्ता पूर्ण नहीं कर पाएंगे क्योंकि उनकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। जबकि निदेशक पद के लिए राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ की नियुक्ति होनी चाहिए ,जिसका स्वास्थय एवं परिवार कल्याण के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के शोध एवं प्रशिक्षण का अनुभव हो। संस्थान में संलग्न शासनादेश (06 मई 1991) के अनुसार चयन प्रक्रिया द्वारा निदेशक की नियुक्ति होनी चाहिए थी,लेकिन प्रोफेसर एन०एल श्रीवास्तव निजी स्वार्थ में कार्यवाहक निदेशक बने हुए है और संस्थान के विकास में अक्षम के साथ भ्रष्ट साबित हो रहे हैं।

6) राष्ट्रीय स्वास्थय मिशन की करोड़ों की धनराशि से संस्थान में निर्माण एवं अनुरक्षण कार्य कराये जा रहे हैं जिसमे प्रोफेसर एन०एल श्रीवास्तव की मनमानी चल रही है।

7) संस्थान का मुख्या उद्देश्य शोध एवं प्रशिक्षण है,जिन उद्देश्यों की पूर्ती के लिए प्रशिक्षण संकाय अदिकारी एवं शोध अदिकारी के पद सर्जित है। शोध सम्बन्धी क्रिया कलाप संस्थान में पूरी तरह से बंद है,तथा शोध सहायकों से कोई कार्य नहीं लिया जा रहा है, प्रोफेसर श्रीवास्तव के पास संस्थान के विकास के लिए कोई भी योजना नहीं है,इनका काम सिर्फ अपना निजी स्वार्थ साधने के लिए उच्च अधिकारियों को संसथान के सम्बन्ध में भ्रमित करते रहते है जिससे आज संस्थान अपने कार्यो और उद्देश्यों को लेकर बदहाली के हाल पर है।

8) पिछली सपा सरकार में मंत्री अहमद हसन के भांजे वा PRO से साठ-गाठ करके प्रोफेसर श्रीवास्तव ने संस्थान को भ्रष्टाचार के गहरे दलदल में डाल दिया हैं,इसके लिए प्रोफेसर श्रीवास्तव मंत्री के भांजे वा PRO को पैसे देने से लेकर अय्याशी के हर साधन उपलब्ध करते रहे हैं तथा PRO को अय्याशी के लिए कई शहरों में महंगे होटलों में रुकाना और अन्य खर्च भी स्वयं प्रोफेसर श्रीवास्तव ही वहन करते रहे हैं तथा अगर प्रोफेसर श्रीवास्तव और पूर्व मंत्री अहमद हसन के PRO की कॉल डिटेल निकलवाई जाएंगी तो साड़ी बातें स्पष्ट हो जाएँगी।

राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान,इंदिरा नगर,लखनऊ,उत्तर प्रदेश के गठन एवं कार्यप्रणाली पर एक नजर —-

राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान,इंदिरा नगर,लखनऊ,उत्तर प्रदेश का जो स्वरुप आज हमारे सम्मुख है इसकी पृस्ठभूमि में जनसँख्या केंद्र का स्वर्णिम अतीत समाहित है। वर्ष 1973 में प्रथम भारत जनसँख्या परियोजना के अंतर्गत जनसँख्या केंद्र नामक संस्था का उदय हुआ,इस केंद्र की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य जान संख्या जनांकि की एवं परिवार कल्याण के क्षेत्र में क्रियात्मक,व्यवाहरिक एवं अकादमिक शोध अध्ययन कर परियोजना के प्रभावों का आंकलन,प्रबंध सूचना एवं मूल्यांकन प्रणाली का विकास तथा प्रशासकों एवं नीति -निर्धारकों को तथ्यात्मक,जनाकारिता से सहयोग प्रदान करना था।

प्रथम भारत जनसँख्या परियोजना की परिसमाप्ति के पश्च्यात वर्ष 1980 में उत्तर प्रदेश में दिव्तीया भारत जनसंख्या परियोजना लागू की गयी। इस परियोजना के अंतर्गत जनसँख्या केंद्र को विस्तृत कर इसकी एक क्षेत्रीय इकाई वाराणसी में स्थापित की गयी। साथ ही प्रदेश के चिकित्साधिकारियों को प्रबंध – प्रशिक्षण प्रदान किये जाने हेतु राज्य मुख्यालय पर प्रबंध प्रशिक्षण प्रकोष्ठ स्थापित किया गया।

वर्ष 1990-91 में उत्तर प्रदेश में प्रशिक्षण आधारित छठे भारत जनसँख्या का शुभारम्भ हुआ। छठी परियोजना के उद्देश्यों की पूर्ती तथा शोध एवं प्रशिक्षण कार्यों के समन्वयन हेतु प्रबंध प्रशिक्षण इकाई का विलय कर जनसँख्या केंद्र को उच्चीकृत किया गया। तत्पश्चात प्रदेश सरकार द्वारा इसे राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान (SIHFW),इंदिरा नगर,लखनऊ,उत्तर प्रदेश का नाम प्रदान किया गया। वर्ष 2001 में उत्तर प्रदेश शासन द्वारा इस संस्थान को प्रदेश के समस्त स्वास्थय एवं परिवार कल्याण प्रशिक्षण केंद्रों का प्रशासनिक,वित्तीय एवं अकादमिक कार्यभार प्रदान किया गया।

इस प्रकार आज राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान,इंदिरा नगर,लखनऊ,उत्तर प्रदेश जहाँ अपने शोध तथा मूल्यांकन अध्ययनों के माध्यम से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण कार्यक्रम के क्षेत्र में सहयोग प्रदान करने हेतु विगत 03 दशकों से भी अधिक समय से निरंतर सम्बद्ध है,वहीँ वह संस्थान विविध प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं प्रशिक्षण परियोजनाएं भी संचालित कर रहा है।

बहुल आबादी एवं स्वास्थय समस्याओं से जूझ रहे उत्तर प्रदेश के लिए आज से लगभग 37 वर्ष पूर्व विश्व बैंक के प्रयोग से आरम्भ की गयी परियोजना क्रियान्वयन तथा निर्माण कार्यों के साथ शोध एकांश का गठन तत्कालीन कार्यक्रम नियामकों की दूरदर्शिता का सुपरिणाम था जो प्रथमत जनसँख्या केंद्र,तत्पश्चात आज राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के रूप में पुष्पित-पल्लवित है।

इस संस्थान द्वारा समस्त शोध अध्ययनों एवं कार्यक्रम मूल्यांकनों की उपयोगिता ने समय-समय पर राज्य प्रशासकों एवं नीति नियामकों को तथ्यपरक जानकारियां उपलब्ध करायी है। संस्थान के शोध कर्मियों ने प्रदेश के सुदूर क्षेत्रों में जाकर आंकड़ा -संकलन किया है ,आम आदमी की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सम्बन्धी अवधारणाओं को एकत्र किया है,विभागीय अधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं से मिलकर उनकी कार्य सम्बन्धी कठिनाईयाँ जानी है और सुझाव प्राप्त किये हैं। संस्थान के शोध कर्मियों ने अकादमिक एवं व्यवहारिक दोनों प्रकार के शोध अध्ययन किये है। वृहत सर्वेक्षण कार्य निष्पादित किये है तथा अभिनव योजनाओं का कुशल संचालन किया है। इस संस्थान द्वारा संचार तथा जनसँख्या शिक्षा के क्षेत्र में किये कार्य आज भी मील का पत्थर है।

यद्पि इस संस्था की स्थापना वर्ष 1973 में हुयी थी। तथापि प्रथम शोध अध्ययन वर्ष 1975 में प्रकाशित हुआ। तब से अब तक संस्थान की शोध इकाई ने परियोजना अवधी में प्रशिक्षण कार्यक्रमों के संचालन के साथ-साथ मुख्यतः निम्नलिखित कोटि के शोध कार्य किये हैं।
जिनकी संख्या शताधिक है :-
1 – लघु एवं वृहद सर्वेक्षण
2 – तथ्यात्मक अध्ययन एवं सत्यापन कार्य
3 – मूल्यांकन / प्रयोगात्मक अध्ययन ।
4 – प्रबंध सूचना एवं मूल्यांकन प्रणाली का विकास ।

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