समाजवादी पार्टी से अलग तैयार हो रहा हैं अखिलेशवादियों कुनबा, अखिलेश करेंगे लीड, चुनाव में जाने की तैयारी, पढ़े ये खबर

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लखनऊ, समाजवादी पार्टी में मतभेद की खाई चौड़ी होती दिख रही है। अब इस तरह के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं कि अखिलेशवादियों और मुलायमवादियों की राह अलग-अलग हो सकती है। जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट जिस तरह से सपा कार्यालय के समानांतर आकार ले रहा है, उससे राजनीतिक गलियारों में इस आशंका को बल मिलता दिख रहा है कि भविष्य में यह ट्रस्ट प्रदेश में नई सियासी इबारत लिख सकता है।

‘टीम अखिलेश’ इस ट्रस्ट को प्रदेश में बिल्कुल उसी तरह से जमाने की तैयारी में है, जैसे किसी राजनीतिक पार्टी के पांव जमाए जाते हैं। इस ट्रस्ट के बैनर तले लखनऊ में ‘अखिलेशवादियों’ का बड़ा सम्मेलन बुलाने की तैयारी चल रही है, जिसके सहारे ‘टीम अखिलेश’ अपने नेता अखिलेश यादव की राजनीतिक ताकत का अहसास उन लोगों को करा देना चाहती है, जो अभी तक यह कहते आ रहे हैं कि अखिलेश मुलायम की राजनीतिक पूंजी पर राजनीति कर रहे हैं।

खुद मुलायम यह कह रहे हैं कि 2012 के चुनाव में वोट उनके नाम पर मांगा गया था, इसलिए किसी को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की जगह अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनवा दिया था।

‘टीम अखिलेश’ लड़ सकती है चुनाव

शिवपाल यादव के समाजवादी पार्टी की कमान संभालने के बाद से जिस तरह से पार्टी में से अखिलेश समर्थित नेताओं को पार्टी के अहम् पदों से बाहर और पार्टी से बाहर किया गया। फिर शिवपाल ने टिकटों में फेरबदल कर अखिलेश के ‘यंगिस्तान’ को किनारे लगाया, इससे इस बात को बल मिला कि बात अगर बनी नहीं तो फिर अलग-अलग चुनाव लड़ने की नौबत भी आ सकती है।

टीम अखिलेश के एक अहम सदस्य ने कहा कि अगर भैया (अखिलेश यादव को उनकी टीम इसी नाम से पुकारती है) के 100 लोगों में से 10 लोगों के टिकट कट जाए तो कबूल है, लेकिन अगर 100 में से 90 लोगों के टिकट काट दिए जाएंगे तो फिर यह तो कबूल नहीं होगा।

अखिलेश भैया ने 5 साल सिर्फ काम किया है। टीम अखिलेश के इस मेंबर ने अपना नाम न छापने के अनुरोध पर कहा, ‘सपा को 2012 में इतना वोट तभी मिला था, जब भैया पार्टी का चेहरा बने। डीपी यादव से लेकर मुख्तार अंसारी तक को उन्होंने पार्टी में शामिल करने से इनकार कर दिया। फिर इस चुनाव में पार्टी के बड़े नेता यह क्यों मानने लगे हैं कि मुख्तार का अपने इलाके में बहुत प्रभाव है और उसके समर्थन के बिना चुनाव नहीं जीता जा सकता है?’

अपने नाम की ‘ब्रैंडिंग’

अखिलेश यादव इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि सपा में उन्हें हाशिए पर लगाने की कोशिश हो रही है। यह स्थापित करने की पुरजोर मुहिम है कि सपा का मतलब मुलायम और शिवपाल हैं। ऐसे में अखिलेश खुद की ‘ब्रैंडिंग’ के लिए मैदान में उतर रहे हैं। वह रथयात्रा शुरू करने जा रहे हैं, जिसमें सारा फोकस उनकी सरकार की 5 साल की उपलब्धियों पर होगा।

‘टीम अखिलेश’ की तैयारी उन्हें एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने की है, जिसके दामन पर भ्रष्टाचार का एक दाग भी नहीं लगा, जो माफिया और भ्रष्टाचारियों से कभी हाथ नहीं मिला सकता। जिन्हें खुलकर काम करने का ज्यादा मौका नहीं मिला, लेकिन उन्होंने दिखा जरूर दिया कि वह अपने सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं कर सकते, भले ही इसके बदले उन्हें कितना ही नुकसान क्यों न उठाना पड़े।

‘टीम अखिलेश मानती है कि इस यात्रा से अखिलेश यादव का अपना वोट बैंक तैयार होगा, जो समाजवादी पार्टी के यादव+मुसलमान के परंपरागत वोट बैंक से अलग होगा।

पार्टी से बनाई दूरी

‘टीम अखिलेश’ ने पार्टी से पूरी दूरी बना ली है। जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट के कार्यालय में एक समानांतर कार्यालय चल रहा है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में समाजवादी पार्टी के कार्यालय में बैठने वाले अखिलेश अब जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट के कार्यालय में बैठ रहे हैं।

समाजवादी पार्टी के कार्यालय और संगठन की पूरी कागजी कार्रवाई संभालने वाले एसआरएस यादव भी अब ट्रस्ट के दफ्तर बैठने लगे हैं। वह इस ट्रस्ट को उसी तरह संभाल रहे हैं, जैसे वह सपा के दफ्तर को संभाला करते थे। एसआरएस यादव को अभी हाल में ही विधान परिषद के लिए मनोनीत किया गया था।

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