गुजरात चुनाव – मोदी और शाह की जोड़ी पर भारी पड़ सकती है ये त्रिमूर्ति, BJP के छूट रहे पसीने !

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अहमदाबाद, मिशन 2017 के लिए गुजरात विधानसभा चुनाव में 150 से ज्यादा सीटें जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा बनाई गयी सारी रणनीतियां फेल साबित हो रही हैं। चाहे वो यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का रोड शो हो या फिर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली वुरी तरह से फ्लॉप साबित हो रही हैं। इसकी वजह भाजपा के वोटबैंक में बिखराव होना है।

भाजपा के लिए पीएम मोदी भी इस बार कोई खाद जादू नहीं कर पा रहे हैं इसके लिए भाजपा सरकार द्वारा लिए गए कुछ फैसले ही गले की फांस बनते जा रहे हैं। गुजरात में दलितों पर अत्याचार के मामले में आयी बढ़ोत्तरी के मामले में सरकार द्वारा की गयी लीपापोती से दलित समाज नाराज है। जिसका प्रतिनिधित्व 35 साल का एक युवा कर रहा है। इसके अलावा पाटीदारों के आंदोलन के समय में युवा पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को फर्जी मुकदमे लगाकर जेल भेजना भी भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है।

गुजरात में बैकपुट पर आने के बाद भाजपा प्रचार के लिए दूसरे राज्यों से नेताओं का आयात कर रही है जिसके लिए भाजपा पैनल ने 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों की फौज को भी चुनाव प्रचार के लिए मैदान में उतारा है। हालांकि यूपी के सीएम इस मामले में फिसड्डी साबित हुए। वलसाड में बीजेपी द्वारा निकाला गया रोड शो ये साबित करता है कि गुजरात में इस बार बीजेपी के लिए कोई भी हथकंडा काम नहीं कर पा रहा है।

योगी का गुजरात में फ्लॉप शो

पिछले दो दशक से गुजरात में शासन करने के बाद इस चुनाव में बीजेपी को हार का डर सताने लगा है। इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए कांग्रेस से बड़ी चुनौती तीन युवा नेता हैं जिनके साथ उनके समुदाय का हुजूम चल रहा है। पिछले दो सालों में तीन युवाओं हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर ने जिसतरह से पाटीदार, ओबीसी और दलित समुदायों को अपने साथ जोड़ा है उससे भाजपा नेतृत्व के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो गयी है।

हार्दिक पटेल –

2015 में गुजरात के पाटीदार समाज को आरक्षण दिलाने के लिए हार्दिक पटेल ने जो आंदोलन शुरू किया था देखते ही देखते वो पूरे गुजरात के पाटीदार समुदाय को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहा। आरक्षण के लिए उनकी मांग अभी भी जारी है। विधानसभा चुनाव की तारीखें न घोषित किए जाने पर हार्दिक पटेल चुनाव आयोग पर भी हमलावर हुए है यही नहीं इसबार चुनाव में पाटीदार समुदाय से उन्होंने खासकर भाजपा को वोट न देने की अपील की है। हार्दिक पटेल को लगातार मिल रहे पाटीदार समुदाय के समर्थन से भाजपा पूरी तरह से बैकफुट पर है जिसके चलते हार्दिक पटेल के ऊपर लगाया गया राष्ट्रद्रोह का केस हटा लिया गया है।

जिग्नेश मेवाणी –

35 साल के जिग्नेश मेवाणी तेज तर्रार युवा दलित नेता बनकर उभरे हैं। ऊना में गौरक्षा के नाम पर दलितों पर हुए अत्याचार के बाद से जिग्नेश एक दलित नेता के रूप में उभर कर सामने आए हैं। उन्होंने दलितों के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई जिससे दलित समाज उनसे जुड़ता चला गया। गुजरात में दिलितों की हुई पिटाई के बाद उन्होंने ‘गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी ज़मीन दो’ के नारे के साथ गुजरात में में दलितों की अस्मिता मार्च का आयोजन किया था। जिग्नेश ने रोहित बेमुला की हत्या के खिलाफ भी गुजरात में दलितों को अपने साथ लामबंध करने का काम किया। दलितों के साथ से अबतक सरकार बनाती आ रही बीजेपी के लिए ये सबसे बड़ी चिंता का विषय है।

अल्पेश ठाकोर –

ओबीसी व एससी एसटी वर्ग को एकजुट करते हुए अल्पेश ठाकोर ने आरक्षण बचाने के नाम पर संघर्ष छेड़ दिया था। सामाजिक आंदोलन को आगे बढाते हुए अल्पेश ने नशाबंदी, शराबबंदी अमल में सख्ती बरतने, बाबा साहब अंबेडकर की विशाल प्रतिमा के निर्माण, बेरोजगार युवाओं को नौकरी के साथ निजी उद्योगों में आरक्षण, किसानों की कर्जमाफ, गौचर भूमि संरक्षण, श्रीराम मंदिर व श्रीराम यूनिवर्सिटी निर्माण, ठाकोर कोळी विकास निगम सहीत दस मांगे सरकार के समक्ष रखी है। जिस तरह से अल्पेश अपने साथ सामाजिक न्याय के नाम पर लोगों का हुजूम जोड़ रहे हैं उससे भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार ये तीनों युवा गुजरात विधानसभा चुनाव को प्रभावित करेंगे। गुजरात की आबादी में ओबीसी का हिस्सा 51 फीसदी है। ऐसे में बड़े पैमाने पर बीजेपी को मुकाबला दिया जा सकता है। इन तीन नेताओं का प्रभाव राज्य की 100 से अधिक सीटों पर हो सकता है।

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